Monday, March 23, 2015

प्रश्नोत्तरी ( मानव और राष्ट्र इतिहास विषय )

प्रश्न :- आधुनिक विज्ञान के अनुसार मनुष्य तो केवल कुछ एक लाख वर्ष पूर्व का ही सिद्ध होता है तो आप किस आधार पर ये इतनी बड़ी संख्या कह रहे हैं ?
उत्तर :- वैदिक काल गणना के अनुसार मानव को पृथिवी पर आए आज से 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हज़ार 115 वर्ष ( 1960853115 वर्ष अब विक्रमी सम्वत् 2071 तक ) हो चुके हैं । लेकिन पहले विज्ञान लाख वर्ष तक पहुँचा फिर धीरे धीरे ये लोग मिले मानव के प्राचीन अवशेषों के आधार पर उससे पीछे होते चले गए । Radio Carbon Dating नामक प्रणाली की सहायता से 60 लाख वर्ष पुराना मनुष्य का सिला हुआ जूता मिला है ( Theosophical Path, August 1923 ) । और इसी प्रकार 12 करोड़ वर्ष पुराने एक गुफा में बनाए हुए चित्र मिले हैं जो कि स्पष्ट है मानव ही बना सकता है पशु नहीं । तो ऐसे ही हमें आशा है और सशक्त अनुसंधान से विज्ञान की गणना 12 करोड़ से भी और पीछे होते होते वैदिक गणना तक पहुँच ही जाएगी ।
प्रश्न :- मनुष्यों की उत्पत्ति तिब्बत पर ही क्यों हुई ? कहीं और क्यों नहीं हुई ?
उत्तर :- क्योंकि तिब्बत का हिमालय क्षेत्र ही मनुष्यों के रहने योग्य अनुकूल जलवायु वाला क्षेत्र था और बाकी के द्वीप जल में डूबे हुए थे और हिमालय की ऊँचाई भी उस समय बहुत कम थी ।
प्रश्न :- मनुष्यों ने प्रथम किस देश को बसाया ?
उत्तर :- मनुष्यों ने प्रथम आर्यवर्त देश को बसाया ।
प्रश्न :- आर्यवर्त देश की सीमाएँ वर्तमान स्थिती के अनुसार कहाँ तक थीं ?
उत्तर :- यह उत्तर में हिमालय, विन्ध्याचल, पश्चिम में सिन्धु नदी, पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी, दक्षिण में कटक नदी । इन नदीयों के बीच में जितना देश है उसको आर्यवर्त कहते हैं ।
प्रश्न :- देशों के नाम किस आधार पर रखे गए हैं ?
उत्तर :- देशों के नाम मनुष्य जातीयों के आधार पर रखे गए हैं ।
प्रश्न :- आर्यवर्त देश का नाम कैसे पड़ा ?
उत्तर :- आर्यवर्त देश का नाम आर्य लोगों के इस देश को निवास स्थान बनाने पर पड़ा है ।
प्रश्न :- आर्य लोग कौन हैं ?
उत्तर :- श्रेष्ठ और धर्मपूर्वक आचरण करने वाले मनुष्यों को ही आर्य कहा जाता है,जो सृष्टि के प्रथम उत्पन्न हुए और तिब्बत के हिमालय से उतर कर इस देश को अपना निवास स्थान बनाया और आर्यवर्त का नाम दिया ।
प्रश्न :- मनुष्य कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :- मनुष्य मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं, आर्य और दस्यु ( दुष्ट स्वभाव से युक्त ) । इन्हीं को देव और असुर भी कहा जाता है ।
प्रश्न :- प्रथम सृष्टि में मनुष्य कैसे थे ?
उत्तर :- प्रथम सृष्टि में मनुष्य केवल आर्य ही थे । दस्यु स्वभाव के नहीं थे ।
प्रश्न :- मनुष्यों का विस्तार पूरे आर्यवर्त देश में कैसे हुआ और कैसे मानव ने प्रथम आर्यवर्त को बसाया ?
उत्तर :- पहले हिमालय का स्तर बहुत कम था और समस्त द्वीप जल में डूबे हुए थे । धीरे धीरे समय बीतने पर जल स्तर कम होता गया और हिमालय ऊपर होता गया और मनुष्यों ने तिब्बत से नेपाल होते होते समय के साथ धीरे धीरे आर्यवर्त के दूसरे भागों में प्रवेश करना शुरू किया । पहले उत्तर प्रदेश फिर पंजाब नेपाल से होते हुए असम ब्रह्मपुत्र नदी के तट तक और मध्य भारत के भाग तक । सिन्धू नदी के तट तक आर्यवर्त बसता चला गया । मनुष्यों की आबादी भी बढ़ने लगी थी और वह भूमी पर विस्तार करता गया । मानव भूमी में खेती करने लगा । नगर और ग्राम बसाने लगा । नदियों के किनारे ग्राम बसाए जाने लगे । पर्वतों और नदीयों के पास ही शिक्षा के लिए गुरूकुल खोले जाने लगे । उस समय भूमी बहुत उपजाऊ हुआ करती थी । वृक्षों पर फल भरे रहते थे । वृक्ष कई कई मील की ऊँचे थे जिनके अवशेष अब Discovery वालों द्वारा पाए गए हैं । इस प्रकार धीरे धीरे समय के साथ मानव पूरी भूमी पर फैलता चला गया ।
प्रश्न :- आर्यवर्त में वैदिक काल कैसा था ?
उत्तर :- गुरू शिष्य परम्परा के होने से शिष्य गुरू के पास जाकर सभ्यता सीखता था,मानव बुद्धि असाधारण हुआ करती थी । समाज में वैदिक चतुर वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी । समाज समृद्धिशाली था । रोग अति न्यून था । समय समय पर यदि रोग बढ़ता भी था तो ऋषियों नें अनेकों आयुर्वेद शास्त्रों की रचना करके समाज का महान उपकार भी किया था और रोगों की चिकित्साएँ की थीं । समाजिक अर्थव्यवस्था में धन का प्रयोग न होकर सामान का आदान प्रदान होता था, परिश्रम का आदान प्रदान होता था । पुत्र और पुत्रीयाँ आज्ञाकारी होते थे । जब कोई वृद्ध आता था तो सभी छोटे खड़े होकर प्रेम पूर्वक नमस्ते करते थे । पत्नी और पती में सदाचार और शिष्टाचार का स्तर उच्च हुआ करता था । निंदा चुगली नहीं हुआ करती थी । सभी अपना ज्ञान वृद्धि के लिए प्रयत्न किया करते थे । बिगप कारण के वाद विवाद नहीं हुआ करते थे । पुरुष बलशाली और पराक्रमी होते थे, स्त्रीयाँ सुन्दर और सुशील होती थीं । स्वच्छता का विषेश ध्यान रखा जाता था ।व्याभिचार न के बराबर था । कोई चोर, ठग, और लम्पटी नहीं होता था । तो ऐसी ही आर्यवर्त की वैदिक व्यवस्था थी । शुद्र समाज भी बहुत विनयशील और सदाचारी होता था । आम जन भी संस्कृत में बातें करते थे । धर्म का पालन करना सबके लिए आवश्यक था । स्त्री पुरुष ब्रह्मचर्य का पालन करते थे ।
प्रश्न :- आर्यवर्त का पतन कैसे हुआ ?
उत्तर :- समय के साथ संस्कृतियों में शिथिलता आने लगती है । जो ओजस्विता का सामर्थ्य पूरे आर्यवर्त में उमड़ रहा था । वह समय आने के साथ शिथिल होने लगा । शैथिल्य का कालचक्र आरम्भ हो चुका था । कुछ जनसंख्या का बढ़ना भी अपना प्रभाव दिखा रहा था । व्यभिचार का फैलना आरम्भ हो चला था । बलशाली लोग निर्बलों पर अत्याचार करने लगे । प्रजा में चारों ओर त्राही त्राही होने लगी थी । समाज में वैदिक मर्यादाएँ भंग होने लगीं थीं । और जिसका असर अब दिखने लगा था ।
प्रश्न :- तो इस आर्यवर्त के पतन को रोकने के लिए आर्यों ने क्या किया ?
उत्तर :- जब आर्य इस पतन को ताड़ गए तो उन्होंने इसे रोकने का उपाय किया और सर्वविद्या में सम्पूर्ण और वेदों और शास्त्रों के ज्ञाता धर्म के धुरंधर महर्षि वैवस्वत मनु के पास जाकर निवेदन किया गया कि आर्यवर्त को पतन से रोकने के लिए कोई दण्ड विधान बनाएँ और कोई ऐसी शासन पद्धति तैय्यार करें जिससे कि प्रजा का महान उपकार हो सके और आप इस आर्यवर्त के प्रथम राजा बनें । पर ऋषि मनु नहीं माने क्योंकि ऋषियों को संसार के शासन से मोह नहीं होता है, परन्तु देवों के बार बार अनुरोध करने पर प्रजा के उपकार के लिए महर्षि मनु ने आर्यवर्त का शासन करना स्विकार किया और राष्ट्र के प्रथम राजा बने । और एक महान ग्रन्थ वैदिक वर्ण व्यवस्था के आधार पर रचा जिसे हम मनु स्मृति के नाम से जानते हैं । जिसमें उन्होंने वैदिक व्यवस्था को भंग करने वालों के लिए कढ़े नियमों का उपादान किया । कारागार और जुर्माने भी लगाए जाते थे । गाली गलौच या अपशब्द करने वाले की जीह्वा काट दी जाती थी । हिंसा करने वाले को अग्नि भेंट कर दिया जाता था । जिससे कि आर्यवर्त में फिर से सुख और स्मृद्धि आने लगी । प्रायश्चित करने के लिए भी कड़े नियम थे जिससे कि मनुष्य सभ्य समाज में पुनः प्रवेश कर सकता था और वही सम्मान प्राप्त कर सकता था । परन्तु सबसे कठोर दण्ड था समाज से बहिष्कृत किया जाना , ये दण्ड मृत्यु से भी बढ़कर था और बहुत बुरा समझा जाता था । जब कोई वैदिक मर्यादाओं को भंग करता था तो उनको आर्य समाज से निकाल कर चतुर्वर्ण से बाहर कर दूर दक्षिण के अरण्यों ( जंगलों ) में भेज दिया जाता था । यदि वो वापिस दस्यु से आर्य बनना चाहे तो उसको मनु के नियमों के अनुसार दण्ड भोग करके पुनः वह आर्य समाज में प्रवेश कर सकता था ।
प्रश्न :- तो ऐसी व्यवस्था करने से परिणाम क्या हुआ ?
उत्तर :- समय के साथ साथ ये जाती बहिष्कार करने का कार्य बहुत उग्र हो चला था । अब वैदिक नियम भंग करने वालों को चुन चुन कर आर्य समाज से बहिष्कृत किया जाने लगा । और देश निकाल लेकर ये लोग दूर दक्षिण भारत के अरण्यों में या उससे भी दूर दूर के द्वीपों पर जा कर बसने लगे । और वहाँ उन स्थानों को अपनी अपनी जाती के नाम से बसाने लगे । कुछ लोग तो दण्ड व्यवस्था का पालन कर पुनः वैदिक आर्य समाज में प्रवेश पा लेते थे परन्तु बहुधा लोग तो आर्यों से ईर्ष्या द्वेष की भावना रखने लगे । और कभी कभी तो ये दस्यु लोग अपनी सेनाएँ लेकर आर्यों से युद्ध भी करते रहे हैं । इन्हीं को संस्कृत के ग्रन्थों में अब देवासुर संग्राम कहा जाता है । और ऐसे ही बहिष्कृत दस्यु लोग आर्यवर्त से हो होकर दूर देशों में बसते चले गए हैं, और उन देशों को अपनी जाती के नाम पर बसाते चले गए हैं । तो ऐसे ही समग्र मानव जाती अपने आर्यत्व से पतित हो होकर पूरी पृथिवी पर फैली है । और इन बहिष्कृत दस्युओं की जातीयों के नाम इनके गुण, कर्म, स्वभाव या इनके नयन नक्षों के आधार पर रखे गए हैं ।
प्रश्न :- दक्षिण में कौन कौन से देश बसे ?
उत्तर :- दक्षिण में मुख्य रूप से कर्णाटक, केरल, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, द्रविड़, सिंहल आदि देश बसे हैं ।
प्रश्न :- अरब देश कैसे बसा ?
उत्तर :- ईरान के पास अरब देश हैं , आर्यवर्त से ही जाती ''बहिष्कृत ब्राह्मणों'' की एक जाती जिसको कि शैख जाती के नाम से जाना जाता था वहाँ जाकर बसी है । और वह स्थान जहाँ घोड़े बहुत उत्तम नसल के पाए जाते हैं । ऐसे देश को शैखों ने बसाया है । संस्कृत में घोड़े को अर्वन् कहा जाता है और वह स्थान जहाँ घोड़े पाए जाते हों उस स्थान को अर्व कहा जाता है । तो ये शैखों ने ऐसे अर्व देश को बसाया जो समय बीतने पर अर्व से अरब बन गया और शैख लोग शेख बन गए । आज भी अरबी गल्फ देशों में घोड़े दुनिया में सबसे उत्तम नसल के होते हैं । इन शैख ब्राह्मणों को अपने मूल आर्य पूरवजों से घृणा हो चुकी थी जिस कारण इन्होंने अपनी भाषा को भी उलटी दिशा से लिखना शुरू किया । अरब में यहूदी मत आते आते इनकी भाषा अरबी हो चुकी थी । और फिर ये अरब का रेगिस्तान ईसाई और बाद में ईस्लाम हुआ ।
प्रश्न :- द्रविड़, पाण्ड्य, चोल आदि देश किस जातीयों ने बसाए ?
उत्तर :- चोल देश ( तमिलनाडु के नीचे वाला भाग और वर्तमान केरल का कुछ भाग ) आर्यवर्त से बहिष्कृत चोल जाती ने बसाया, संस्कृत में चोरी करने वालों को चौर बोला जाता है, और यही जो चौर स्वभाव वाले लोग थे जिनको इनके स्वभाव के कारण जाती बहिष्कार के दण्ड दिए गए और एक समान मिलजाने पर इनकी एक अलग से दस्यु जाती हो गई जिसको यह चौर शब्द को भ्रष्ट करके चौल या बाद में चोल कहने लगे । तो दक्षिण भारत में यही चोल जाती के लोगों ने चोल प्रदेश को बसाया है । और एसे ही व्यापारियों को आर्य लोग पणिक या वणिक कहते थे, जो कुछ धर्म भ्रष्ट होकर के धन लोलुप हो गए और ऐसे ही लोगों ने समाजिक बहिष्कार के बाद आकर दक्षिण में डेरा डाला और वही पणिक से पाण्ड्य लोग कहलाने लगे और अपने नाम से देश को बसाया । ठीक इसी प्रकार किसी कारण वश दूसरी क्षत्रीय जातीयाँ जैसे द्रविड़, कर्णाटक, केरल और आन्ध्र जातीयों ने दक्षिण भारत में देश प्रदेश अपने अपने नाम से बसाए हैं । यही लोग हैं जिनकी भाषाएँ समय बीतने के साथ ही संस्कृत से भ्रष्ट हो होकर ही तमिल, मलयालम, तेलुगु , कन्नड़ आदि हुई हैं ।
प्रश्न :- सिंहल देश किसने बसाया है ?
उत्तर :- आर्यवर्त के उत्तर में सिंह का शिकार करने वाले क्षत्रीयों को सिंहल कहा जाता था । जैसे वृष या वृष्भ ( बैल ) का शिकार करने वाले क्षत्रीयों को वृषल कहा जाता था । और संस्कृत में सिंह कहते हैं Lion को । तो यही सिंहली क्षत्रीय जाती द्रविड़ आदी प्रदेश को लांघ कर जिस द्वीप पर जाकर बसी उसे ही सिंहल द्वीप के नाम से बसाया है । इसी कारण राजपूताना और महाराष्ट्र के राजपूत क्षत्रीयों को भी सिंहली कहा जाताथा और सम के साथ यह शब्द छोटा होकर सिंह बन गया और क्षत्रीयों के नाम केपीछे लगने लगा । मुख्य रूप से ये क्षत्रीय बंगाल से ही जाकर सिंहल द्वीप पर बसे हैं । और यह सिंहल शब्द ही बिगड़ कर अंग्रेज़ी में Cylon हुआ है । जहाँ आज के श्रीलंका में भी ये दोप्रकार के लोग पाए जाते हैं , सिंहली और तमिल, और इसी कारण लंका के ध्वज पर सिंह का चित्र है जिसने कृपाण को पकड़ रखा है । यह ध्यान रहे कि जो वर्तमान श्रीलंका है वह प्राचीन सिंहल द्वीप का एक छोटा सा ही भाग था समय आने पर लंका की शंका की शेष भूमी अब जल में डूब चुकी है । और सिंहल में पहले सिंहली और बाद में द्रविड़ी जाकर बसे हैं तो ये दोनों ही आर्यों की पतित शाखाएँ ही हैं । और यह लंका भूमी को सुर्वण भूमी भी कहा जाता है । खोजों से पता लगता है कि इस भूमी में बहुत सा सोना निकलता था । और यह बात सत्य है कि यहाँ के सिंहली राजा भी अपने राज्य महलों को सुवर्ण से बनाते रहे हैं । रामायण काल का राजा रावण इसी का उदहारण है । जिसकी लंका में सुवर्ण महल थे । ये बात मनघड़ंत नहीं है । और सिंहल का जो बाकी बचा हुआ भाग था उसमें ये सात द्वीप आते थे :- अंगद्वीप, यवद्वीप, मलयद्वीप, शंखद्वीप, कुशद्वीप, वराहद्वीप आदि भारतवर्ष के अनुद्वीप ही हैं जो कि दर दूर तक फैले थे । जिनमें से कुछ द्वीप जल में डूब चुके हैं और बाकी कुछ अभी भी हैं , जैसे मलयद्वीप ( मलेशिया ) जिसपर द्रविड़ी लोग जाकर बसे जो कि मलयालम भाषा का अधिकतर प्रयोग करते थे । तो यही मलयाली लोगों ने मलेशिया , और ऐसे ही आगे जाकर बलिद्वीप ( इंडोनेशिया ) को बसाया है । तो ऐसे ही पतित आर्यों की शाखाएँ ही विस्तृत हो होकर पूरे विश्व में फैली हैं । ( प्रमाण :- Historical History of the world Vol 1, p.536 )
प्रश्न :- आन्ध्र को किसने बसाया ?
उत्तर :- आन्ध्र को विशाखापट्टनम के तट पर आर्यों में क्षत्रीय महाराज विश्वामित्र के पतित पुत्रों की जाती के आन्ध्र लोगों ने बसाया है ,और आगे यही आन्ध्र लोगों ने द्वीपों को लांघते हुए एक विशाल द्वीप को बसाया जो चारों ओर जल से घिरा हुआ था उसका नाम रखा गया आन्ध्रालय जो समय के साथ विकृत होकर अस्ट्रेलिया देश कहा जाने लगा । अस्ट्रेलिया के मूल निवासीयों को इण्डियन कहा जाता है भारत के लोगों की भांती उनमें भी छुआछूत की प्रथा है वे दूसरों के हाथ का छुआ नहीं खाते हैं । ( प्रमाण :- Hamsworth History of the world p.5675 )
प्रश्न :- चीन देश कैसे बसा और किसने बसाया ?
उत्तर :- महाभारत में भी चीन या फिर महाचीन का उल्लेख आता है जिसका राजा भगदत युधिष्ठिर द्वारा किए राजसूय यज्ञ में आया था । तो इस चीन देश को लगभग 9 करोड़ वर्ष पहले ही तिब्बत के पार आर्यों में से ही निकली सूर्यवंशी क्षत्रीय चीना नाम की जाती ने अपने नाम से बसाया है । चीना शब्द का संस्कृत में अर्थ है तेज़ स्वास्थ्य वाले लोग । तो यही लोग जब हिमालय के दूसरी ओर में जाकर बसे तो इनकी भाषा और संस्कृती बदलती चली गई । लेकिन कुछ बातें इस जाती ने संजो कर रखी जैसे कि चीनी लिप्पी , प्रचीन ब्राह्मी लिप्पी ( जिसमें पहले संस्कृत लिखी जाती थी ) की तर्ज़ पर चित्रलिप्पी है जिसे चित्र बना कर समझाया जाता है । आज इसी चीना जाती को मंगोल जाती के नाम से जाना जाता है जो चीन में फैली और समय के साथ फिर दूर के द्वीपों पर विस्तृत होती गई , मंगोलिया, जापान, कोरिया आदि देशों तक यही पतित क्षत्रीयों का विस्तार हुआ है । ( प्रमाण :- Rigvedic India, p 180 - 181 )
प्रश्न :- अफगानिस्तान कैसे बसा ?
उत्तर :- आर्यों की एक पतित चन्द्रवंशी क्षत्रीय जाती जिसको प्रतिष्ठान कहा जाता था । तो यहाँ इस खैबर पख्तूनख्वा ( पाकिस्तान ) और आगे जो अफगानिस्तान है यहाँ की सत्ता को गणराज्य कहा जाता था । और ऐसे ही सात गणराज्य पूरी अफगानिस्तान की धरती पर फैले थे जिसको महाभारत में पाण्डवों ने जीत भी लिया था । जिनको सप्तगणों का नाम किसी काल में दिया गया था, और प्रतिष्ठानों ने आगे चलकर इसे उपगण या फिर अपगण के नाम से राज्य स्थापित किया है । जो ईस्लाम के आने से पहले अपगणस्थान ही कहलाता रहा है और शब्दों के समय के साथ भ्रष्ट होने के बाद बिगड़ बिगड़ कर ये अफगानिस्तान कहा जाने लगा । और प्रतिष्ठान नामक जाती ( पठान )के नाम से जानी जाने लगी । और ये अफ्रीदी लोग उस समय के गण लोग ही हैं । आज भी किसी समय के प्रतिष्ठान गणराजा महाराजा गजराज सिंह का बसाया हुआ शहर गजनी आज भी उसी नाम से जाना जाता है और महाभारत के प्रतिष्ठान गण राजा शकुनी के राज्य गान्धार का नाम आज कान्धार के नाम से जाना जाता है। ( प्रमाण :- Chips from german workshop, p. 235 )
प्रश्न :- बालोचिस्तान देश कैसे बसा ?
उत्तर :- किरात नामक क्षत्रीय जाती जिस स्थान पर बसी उस स्थान को ही बल में उच्च स्थान का नाम दिया गयप क्योंकि किरात लोग अपने पराक्रम के नाम से जाने जाते रहे हैं । और बल में उच्च होने के कारण देश को नाम दिया गया बल्ल उच्च स्थान , जो समय के साथ भ्रष्ट होकर बालोचिस्तान बन गया ।
प्रश्न :- ईरान देश कैसे बसा ?
उत्तर :- आर्यों के ही पतित रूप पारसी जो कि गण राज्यों से आगे निकल गए वहाँ उस देश को अपनी पूर्व जाती के नाम से बसाया जिसका नाम आर्यान रखा, जो कि समय पड़ने के साथ साथ ही ईरान हो गया । और ये पारसी लोग आर्यवर्त से ही नदियों के नाम भी लगे , जिससे कि इन्होंने अपने देश आर्यान की नदियों के नाम को रखा , जैसे कि हरहवती जो कि सरस्वति नदि का अपभ्रंश रूप है । और एक नदी का नाम सरयू के स्थान पर हरयू नदी रखा । ये वही सरयू नदी है जो उत्तर प्रदेश में बहती है । तो ऐसे ही ईरान देश बसा ।
प्रश्न :- मिस्त्र देश कैसे बसा ?
उत्तर :- मिस्त्र देश जिसको कि आजकल Egypt भी कहते हैं । अफ्रीका और एशिया को स्वेज़ नामक नहर ने प्रचीन काल से अलग कर रखा है । इस नहर को लांघकर ही आर्यों ने मिस्त्र देश को बसाया है । क्योंकि जैसे प्राचीन काल से ही नगरों को नदी के किनारे पर बसाने की प्रथा रही है ठीक वैसे ही आर्यों से पतित द्रविड़ियों और पणिकों ने नील नामक नदी के किनारे मिस्त्र देश को बसाया है । ये लोग Persian Gulf से होते हुए वहाँ अफ्रीकी देश मिस्त्र को गए हैं । मिस्त्र देश के तीन नाम हैं कमित, हपि और मिस्त्र । कुमृत् शब्द संस्कृत का है जिसका अर्थ है काली मिट्टी, तो जिस देश की मिट्टी काली है जो नील नदी के किनारे बसा है वह कुमृत् हुआ और समय के बीतने से ये नाम विकृत होकर कमित बन गया । अप का अर्थ है पानी नील नदी दुनिया में सबसे बड़ी है जिसके जल को अप और नदी को अपि जो समय के साथ बिगड़ कर हपि हो गया है । तीसरा शब्द है मिस्त्र जिसका संस्कृत में अर्थ हुआ मिश्रित तो यह नाम किस आधार पर पड़ा यह कहना कठिन है । और ये मिस्त्र निवासी ममीयों की कब्रों के लिए इमली की लकड़ीयों का प्रयोग करते रहे हैं । तो यह इमली की लकड़ी मद्रास प्रांत से ही वहाँ गई है जिससे सिद्ध है कि वे लोग आर्यों की शाखा हैं । इनके पिरामिडों की लिप्पीयों से पता चला है कि ये लोग अपने को सूर्यवंशी मानते थे और सूर्य की पूजा करते थे, और मनु को ही अपना मूल पुरुष समझते रहे हैं । जिससे कि ये लोग आर्य ही सिद्ध होते हैं । ( प्रमाण :- India in Greece p.178 )
प्रश्न :- अफ्रीका के बाकी देश कैसे बसे ?
उत्तर :- आर्यों की ही एक पतिति क्षत्रीय जाती थी झल्ल जिसने मिस्त्र पार करके अफ्रीका को बसाया है यही झल्ल लोगों को समय के साथ जुलू कहा जाने लगा । और अधिकतर ये लोग काले होते हैं । ऐतरेय ब्राह्मण के ३१ अध्याय के अन्त में मन्त्र आता है जिसमें लिखा है कि दुष्यन्त के पुत्र राजा भरत ने मष्णार नामक देश में सुवर्ण अलंकारों से युक्त बड़े बड़े श्वेत दाँतों वाले हाथीयों के एक सौ सात वृंद दान में दिए । और साथ ही इस मंत्र में लिखा है कि राजा भरत से पहले या बाद में ऐसा किसी और ने नहीं किया है । अब प्रश्न ये उठता है कि ये मष्णार देश है कहाँ पर ? Menual Of Geography देखने पर पता चलता है कि ये अफ्रीकाखण्ड में दक्षिणी रोडेशिया देश है, जहाँ मष्णा नामक स्थान है । पूर्व काल में यहाँ बहुत सोना होता था और हाथीयों की बहुतायात थी ऐसा वहाँ पर विद्यमान प्रचीन खण्डरों से पता लगा है । तो यही मष्णा नामक देश वही मष्णार है । जिसके बारे में ऐतरेय ब्राह्मण लिखता है । एक और प्रमाण इस प्रकार है कि भविष्य पुराण में आता है कि ( रथक्रान्ते नराः कृष्णाः प्रायशो विकृताननाः । आममांसभुजाः सर्वे शूराः कुंचितमूर्द्धजाः ) जिसका अर्थ है कि यहाँ मष्णार में रहने वाले लोग काले, विकृत मूँह वाले, कच्चा माँस खाने वाले और सिर से घुंघराले बाल वाले होते हैं । यही स्थिति आजकल सभी अफ्रीका वासीयों की है जिनको हम Nigros कहते हैं । तो ये लोग भी इसी प्रकार आर्यवर्त से यहाँ आकर किसी काल में बसे हैं ।
प्रश्न :- तो क्या सारी मानव जाती ही ऐसे आर्यवर्त से जा जाकर दूर देश में बसी है ?
उत्तर :- अवश्य ही ऐसा है कि आबादी बढ़ने के साथ साथ और ऐसे ही कुछ जाती बहिष्कार के दण्ड से ही मानव पूरी भूमी पर फैल गया है । और ऐसे ही अफ्रीका से युरोप देशों तक मानव का विस्तार हो गया है । तो ऐसे में पूरी मानव जाती एक ही सिद्ध होती है ।
प्रश्न :- लेकिन आर्य लोग तो बाहर के देशों से आए हम तो ऐसा मानते हैं और यहाँ के मूल निवासी तो तोई और हैं, क्ता ये बात गलत है ?
उत्तर :- आर्य लोग ही आर्यवर्त के मूल निवासी हैं, और बाहर किसी देश से आने का प्रश्न नहीं बल्की आर्य ही बाहर जाकर किसी दूसरे देशों में बसे हैं जैसे हमने कुछ देशों के उदाहरणों से आपको ऊपर सिद्ध किया है । हाँ आर्य लोग बाहर विदेशों में जाकर बसते रहे हैं और कुछ लोग वापिस घूम फिर कर अपने देश में आए हों तो बात मानने वाली हैं । तो मूल निवासी तो पूरी पृथिवी का मनुष्य एक ही है । आर्यों के बाहर विदेशों से आने की बातें तो ईसाईयों और अम्बेदकर वादीयों ने आर्यों से घृणा और द्वेष फैलाने के । उद्देश्य से लिखी हैं । क्योंकि उनकी बातें पक्षपात पूर्ण और तार्किक वैज्ञानिक आधार पर कहीं ठहरती नहीं हैं । और ये अम्बेदकर के पुत्रों का मान्सिक स्तर बिगड़ा हुआ है , जब इनसे पूछो कि आर्य लोग किस देश से आकर बसे थे ? तो पहले तो ये लोग उत्तर में ब्राह्मण ब्राह्मण चिल्ला कर आपको माँ बहन की गंदी गालीयाँ देंगे, और फिर कोई बोलेगा कि आर्य ईरान से आए ,कोई कहेगा युरोप से आए । तो ऐसे मूर्खतापूर्वक कुतर्क करके ये बौद्ध अम्बेदकरवादी अपने माता पिता के संस्कारों का प्रदर्शन करते रहते हैं ।
मानव जाती एक है ,अतः आर्यों लौट चलो वेदों की ओर ।।
ओ३म् तत् सत् ।।

Sunday, March 15, 2015

बलात्कार एक बङी समस्या

'' कल जब हम दिल्ली गए हुए थे तो वहाँ पर एक लङकी ने हमसे पूछा यार इस देश मे रेप कब बंद होगेँ
तो हमने कहा बहन मे तुम्हे एक कहानी सुनाती हुँ ध्यान से सुनना

! एक लङकी थी रात को आँफिस से वापस लोट रही थी तो देर भी हो गई थी पहली बार ऐसा हुआ ओर काम भी ज्यादा था तो टाइम का पता ही नही चला
वो सीधे बस स्टेशन पहुँची
वहाँ एक लङका खङा था वो लङकी उसे देखकर डर गई की कही उल्टा सीधा ना हो जाए
तभी वो लङका पास आया ओर कहा बहन तू मौका नही जिम्मेदारी हे मेरी ओर जब तक तुझे कोई गाङी नही मिल जाती मैँ तुम्हे छोङकर कहीँ नही जाउँगा
'' dont worry
वहाँ से एक ओटो वाला गुजर रहा था लङकी को अकेली लङके के साथ देखा तो तुरंत ओटो रोक दी ओर कहा
कहाँ जाना हे मेडम आइये मे आपको छोङ देता हुँ
लङकी ओटो मे बेठ गई रास्ते मे वो ओटो वाला बोला तुम मेरी बेटी जैसी हो इतनी रात को तुम्हे अकेला देखा तो ओटो रोक दी आजकल जमाना खराब हेना और अकेली लङकी मौका नही जिम्मेदारी होती हे
लङकी जहाँ रहती थी वो एरिया आ चुका था वो ओटो से उतर गई
ओर ओटो वाला चला गया
लेकिन अब भी लङकी को दो अंधेरी गली से होकर गुजरना था

वहाँ से सिर्फ चलकर गुजरना था
तभी वहाँ से पानीपुरी वाला गुजर रहा था शायद वो भी काम से वापस घर की ओर गुजर रहा था
लङकी को अकेली देखकर कहा आओ मेँ तुम्हे घर तक छोङ देता हुँ उसने अपने ठेले को वही छोङकर एक टोर्च लेकर उस लङकी के साथ अंधेरी गली की और निकल पङा

वो लङकी घर पहुँच चुकी थी आज किसी की बेटी , बहन सही सलामत घर पहुँच चुकी थी

मेरे भारत को तलाश हे ऐसे तीन लोगो की
1) वो लङका जो बस स्टेड पर खङा था
2)वो ओटो वाला ओर
3) वो पानीपुरी वाला

जिस दिन ये तीन लोग मिल जाएगे उस दिन मेरे भारत मेँ रेप होना बंद हो जाएंगे

धन्यवाद

देह अमर नहीं

एक राजा को फूलों का शौक था। उसने सुंदर, सुगंधित फूलों के पचीस गमले अपने शयनखंड के प्रांगण में रखवा रखे थे। उनकी देखभाल के लिए एक नौकर रखा गया था। एक दिन नौकर से एक गमला टूट गया। राजा को पता चला तो वह आगबबूला हो गया। उसने आदेश दिया कि दो महीने के बाद नौकर को फांसी दे दी जाए। मंत्री ने राजा को बहुत समझाया, लेकिन राजा ने एक न मानी। फिर राजा ने नगर में घोषणा करवा दी कि जो कोई टूटे हुए गमले की मरम्मत करके उसे ज्यों का त्यों बना देगा, उसे मुंहमांगा पुरस्कार दिया जाएगा। कई लोग अपना भाग्य आजमाने के लिए आए लेकिन असफल रहे।

एक दिन एक महात्मा नगर में पधारे। उनके कान तक भी गमले वाली बात पहुंची। वह राजदरबार में गए और बोले, ‘राजन् तेरे टूटे गमले को जोड़ने की जिम्मेदारी मैं लेता हूं। लेकिन मैं तुम्हें समझाना चाहता हूं कि यह देह अमर नहीं तो मिट्टी के गमले कैसे अमर रह सकते हैं। ये तो फूटेंगे, गलेंगे, मिटेंगे। पौधा भी सूखेगा।’ लेकिन राजा अपनी बात पर अडिग रहा।

आखिर राजा उन्हें वहां ले गया जहां गमले रखे हुए थे। महात्मा ने एक डंडा उठाया और एक-एक करके प्रहार करते हुए सभी गमले तोड़ दिए। थोड़ी देर तक तो राजा चकित होकर देखता रहा। उसे लगा यह गमले जोड़ने का कोई नया विज्ञान होगा। लेकिन महात्मा को उसी तरह खड़ा देख उसने आश्चर्य से पूछा, ‘ये आपने क्या किया?’ महात्मा बोले, ‘मैंने चौबीस आदमियों की जान बचाई है। एक गमला टूटने से एक को फांसी लग रही है। चौबीस गमले भी किसी न किसी के हाथ से ऐसे ही टूटेंगे तो उन चौबीसों को भी फांसी लगेगी। सो मैंने गमले तोड़कर उन लोगों की जान बचाई है।’ राजा महात्मा की बात समझ गया। उसने हाथ जोड़कर उनसे क्षमा मांगी और नौकर की फांसी का हुक्म वापस ले लिया।

आल्हाखण्ड

आल्हाखण्ड लोककवि जगनिक द्वारा लिखित एक वीर रस प्रधान काव्य हैं जो परमाल रासो का एक खण्ड माना जाता है। आल्हाखण्ड में आल्हा और ऊदल नामक दो प्रसिद्ध वीरों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन हैं।
उल्लेखनीय तथ्य

    'आल्हाखण्ड' में महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों- आल्हा और ऊदल (उदय सिंह) का विस्तृत वर्णन है। कई शताब्दियों तक मौखिक रूप में चलते रहने के कारण उसके वर्तमान रूप में जगनिक की मूल रचना खो-सी गयी है, किन्तु अनुमानत: उसका मूल रूप तेरहवीं या चौदहवीं शताब्दी तक तैयार हो चुका था।
    आरम्भ में वह वीर रस-प्रधान एक लघु लोकगाथा (बैलेड) रही होगी, जिसमें और भी परिवर्द्धन होने पर उसका रूप गाथाचक्र (बैलेड साइकिल) के समान हो गया, जो कालान्तर में एक लोक महाकाव्य के रूप में विकसित हो गया।
    'पृथ्वीराजरासो' के सभी गुण-दोष 'आल्हाखण्ड' में भी वर्तमान हैं, दोनों में अन्तर केवल इतना है कि एक का विकास दरबारी वातावरण में शिष्ट, शिक्षित-वर्ग के बीच हुआ और दूसरे का अशिक्षित ग्रामीण जनता के बीच।
    'आल्हाखण्ड' पर अलंकृत महाकाव्यों की शैली का कोई प्रभाव नहीं दिखलाई पड़ता। शब्द-चयन, अलंकार विधान, उक्ति-वैचित्र्य, कम शब्दों में अधिक भाव भरने की प्रवृत्ति प्रसंग-गर्भत्व तथा अन्य काव्य-रूढ़ियों और काव्य-कौशल का दर्शन उसमें बिलकुल नहीं होता। इसके विपरीत उसमें सरल स्वाभाविक ढंग से, सफ़ाई के साथ कथा कहने की प्रवृत्ति मिलती है, किन्तु साथ ही उसमें ओजस्विता और शक्तिमत्ता का इतना अदम्य वेग मिलता है, जो पाठक अथवा श्रोता को झकझोर देता है और उसकी सूखी नसों में भी उष्ण रक्त का संचार कर साहस, उमंग और उत्साह से भर देता है। उसमें वीर रस की इतनी गहरी और तीव्र व्यंजना हुई है और उसके चरित्रों को वीरता और आत्मोत्सर्ग की उस ऊँची भूमि पर उपस्थित किया गया है कि उसके कारण देश और काल की सीमा पार कर समाज की अजस्त्र जीवनधारा से 'आल्हखण्ड' की रसधारा मिलकर एक हो गयी है।
    इसी विशेषता के कारण उत्तर भारत की सामान्य जनता में लोकप्रियता की दृष्टि से 'रामचरितमानस' के बाद 'आल्हाखण्ड' का ही स्थान है और इसी विशेषता के कारण वह सदियों से एक बड़े भू-भाग के लोककण्ठ में गूँजता चला आ रहा है।

आल्हाखण्ड की लोकप्रियता

कालिंजर के राजा परमार के आश्रय मे जगनिक नाम के एक कवि थे, जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों -आल्हा और ऊदल (उदयसिंह) के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमश: सारे उत्तरी भारत में विशेषत: उन सब प्रदेशों में जो कन्नौज साम्राज्य के अंतर्गत थे-हो गया। जगनिक के काव्य का कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषा भाषी प्रांतों के गांव-गांव में सुनाई देते हैं। ये गीत ‘आल्हा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं और बरसात में गाये जाते हैं। गावों में जाकर देखिये तो मेघगर्जन के बीच किसी अल्हैत के ढोल के गंभीर घोष के साथ यह हुंकार सुनाई देगी-

    बारह बरिस लै कूकर जीऐं ,औ तेरह लौ जिऐं सियार।
    बरिस अठारह छत्री जिऐं ,आगे जीवन को धिक्कार।

इस प्रकार साहित्यिक रूप में न रहने पर भी जनता के कंठ में जगनिक के संगीत की वीरदर्पपूर्ण प्रतिध्वनि अनेक बल खाती हुई अब तक चली आ रही है। इस दीर्घ कालयात्रा में उसका बहुत कुछ कलेवर बदल गया है। देश और काल के अनुसार भाषा में ही परिवर्तन नहीं हुआ है, वस्तु में भी बहुत अधिक परिवर्तन होता आया है। बहुत से नये अस्त्रों, (जैसे बंदूक, किरिच), देशों और जातियों (जैसे फिरंगी) के नाम सम्मिलित होते गये हैं और बराबर हो जाते हैं। यदि यह साहित्यिक प्रबंध पद्धति पर लिखा गया होता तो कहीं न कहीं राजकीय पुस्तकालयों में इसकी कोई प्रति रक्षित मिलती। पर यह गाने के लिये ही रचा गया था। इसमें पंडितों और विद्वानों के हाथ इसकी रक्षा के लिये नहीं बढ़े, जनता ही के बीच इसकी गूंज बनी रही-पर यह गूंज मात्र है मूल शब्द नहीं।
आल्हा-ऊदल के गीत

आल्हा का प्रचार यों तो सारे उत्तर भारत में है पर बैसवाड़ा इसका केन्द्र माना जाता है, वहाँ इसे गाने वाले बहुत अधिक मिलते हैं। बुंदेलखंड में -विशेषत: महोबा के आसपास भी इसका चलन बहुत है। आल्हा गाने वाले लोग अल्हैत कहलाते हैं। इन गीतों के समुच्चय को सर्वसाधारण ‘आल्हाखंड’ कहते हैं जिससे अनुमान मिलता है कि आल्हा संबंधी ये वीरगीत जगनिक के रचे उस काव्य के एक खंड के अंतर्गत थे जो चंदेलों की वीरता के वर्णन में लिखा गया होगा। आल्हा और उदल परमार के सामंत थे और बनाफर शाखा के क्षत्रिय थे। इन गीतों का एक संग्रह ‘आल्हाखंड’ के नाम से छपा है। फर्रुखाबाद के तत्कालीन कलेक्टर मि.चार्ल्स इलियट ने पहले पहल इनगीतों का संग्रह करके छपवाया था।
आल्हाखंड में तमाम लड़ाइयों का ज़िक्र है। शुरूआत मांड़ौ की लड़ाई से है। मांड़ौ के राजा करिंगा ने आल्हा-ऊदल के पिता जच्छराज-बच्छराज को मरवा के उनकी खोपड़ियां कोल्हू में पिरवा दी थीं। ऊदल को जब यह बात पता चली तब उन्होंने अपने पिता की मौत का बदला लिया तब उनकी उमर मात्र 12 वर्ष थी। आल्हाखंड में युद्ध में लड़ते हुये मर जाने को लगभग हर लड़ाई में महिमामंडित किया गया है:-

मुर्चन-मुर्चन नचै बेंदुला,उदल कहैं पुकारि-पुकारि,
भागि न जैयो कोऊ मोहरा ते यारों रखियो धर्म हमार।
खटिया परिके जौ मरि जैहौ,बुढ़िहै सात साख को नाम
रन मा मरिके जौ मरि जैहौ,होइहै जुगन-जुगन लौं नाम।

अपने बैरी से बदला लेना सबसे अहम बात माना गया है:-

    ‘जिनके बैरी सम्मुख बैठे उनके जीवन को धिक्कार।’

इसी का अनुसरण करते हुये तमाम किस्से उत्तर भारत के बीहड़ इलाकों में हुये जिनमें लोगों ने आल्हा गाते हुये नरसंहार किये या अपने दुश्मनों को मौत के घाट उतारा।

पुत्र का महत्व पता चला है जब कहा जाता है:-

    जिनके लड़िका समरथ हुइगे उनका कौन पड़ी परवाह!

स्वामी तथा मित्र के लिये कुर्बानी दे देना सहज गुण बताये गये हैं:-

    जहां पसीना गिरै तुम्हारा तंह दै देऊं रक्त की धार।

आज्ञाकारिता तथा बड़े भाई का सम्मान करना का कई जगह बखान गया है। इक बार मेले में आल्हा के पुत्र इंदल का अपहरण हो जाता है। इंदल मेले में उदल के साथ गये थे। आल्हा ने गुस्से में उदल की बहुत पिटाई की:-

    हरे बांस आल्हा मंगवाये औ उदल को मारन लाग।

ऊदल चुपचाप मार खाते -बिना प्रतिरोध के। तब आल्हा की पत्नी ने आल्हा को रोकते हुये कहा:-

    हम तुम रहिबे जौ दुनिया में इंदल फेरि मिलैंगे आय
    कोख को भाई तुम मारत हौ ऐसी तुम्हहिं मुनासिब नाय।

यद्यपि आल्हा में वीरता तथा अन्य तमाम बातों का अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन है तथापि मौखिक परम्परा के महाकाव्य आल्हाखण्ड का वैशिष्ट्य बुन्देली का अपना है। महोबा 12वीं शती तक कला केन्द्र तो रहा है जिसकी चर्चा इस प्रबन्ध काव्य में है। इसकी प्रामाणिकता के लिए न तो अन्तःसाक्ष्य ही उपादेय और न बर्हिसाक्ष्य। इतिहास में परमार्देदेव की कथा कुछ दूसरे ही रुप में है परन्तु आल्हा खण्ड का राजा परमाल एक वैभवशाली राजा है, आल्हा और ऊदल उसके सामन्त है। यह प्रबन्ध काव्य समस्त कमज़ोरियों के बावजूद बुन्देलों जन सामान्य की नीति और कर्तव्य का पाठ सिखाता है। बुन्देलखण्ड के प्रत्येक गांवों में घनघोर वर्षा के दिन आल्हा जमता है।
भरी दुपहरी सरवन गाइये, सोरठ गाइये आधी रात।
आल्हा पवाड़ा वादिन गाइये, जा दिन झड़ी लगे दिन रात।।

Tuesday, March 10, 2015

हिंदुस्तान के गौरवशाली ऋषि-मुनियों का वैज्ञानिक इतिहास !

हिंदुस्तान के गौरवशाली ऋषि-मुनियों का वैज्ञानिक इतिहास !

हिंदु वेदों को मान्यता देते हैं और वेदों में विज्ञान बताया गया है। केवल सौ वर्षों में पृथ्वी को नष्टप्राय बनाने के मार्ग पर लाने वाले आधुनिक विज्ञान की अपेक्षा, अत्यंत प्रगतिशील एवं एक भी समाज विघातक शोध न करनेवाला प्राचीन ‘हिंदु विज्ञान’ था।
पूर्वकाल के शोधकर्ता हिंदु ऋषियों की बुद्धि की विशालता देखकर आज के वैज्ञानिकों को अत्यंत आश्चर्य होता है। पाश्चात्त्य वैज्ञानिकों की न्यूनता सिद्ध करनेवाला शोध सहस्रों वर्ष पूर्व ही करने वाले हिंदु ऋषि-मुनि ही खरे वैज्ञानिक शोधकर्ता हैं।

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• गुरुत्वाकर्षण का गूढ उजागर करनेवाले भास्कराचार्य !
भास्कराचार्य जी ने अपने (दूसरे) ‘सिद्धांत शिरोमणि’ ग्रंथ में विषय में लिखा है कि, ‘पृथ्वी अपने आकाश का पदार्थ स्व-शक्ति से अपनी ओर खींच लेती हैं । इस कारण आकाश का पदार्थ पृथ्वी पर गिरता है’ । इससे सिद्ध होता है कि, उन्होंने गुरुत्वाकर्षण का शोध न्यूटन से ५०० वर्ष पूर्व लगाया।
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• परमाणु शास्त्र के जनक आचार्य कणाद !
अणुशास्त्रज्ञ जॉन डाल्टनके २५०० वर्ष पूर्व आचार्य कणादजीने बताया कि, ‘द्रव्यके परमाणु होते हैं । ’विख्यात इतिहासज्ञ टी.एन्. कोलेबु्रक जी ने कहा है कि, ‘अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ युरोपीय शास्त्रज्ञों की तुलना में विश्व विख्यात थे।’
• कर्करोग प्रतिबंधित करनेवाला पतंजलीऋषिका योगशास्त्र !
‘पतंजली ऋषि द्वारा २१५० वर्ष पूर्व बताया ‘योगशास्त्र’, कर्करोग जैसी दुर्धर व्याधि पर सुपरिणामकारक उपचार है । योगसाधना से कर्करोग प्रतिबंधित होता है ।’ – भारत शासन के ‘अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था’के (‘एम्स’के) ५ वर्षों के शोध का निष्कर्ष !
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• औषधि-निर्मिति के पितामह : आचार्य चरक !
इ.स. १०० से २०० वर्ष पूर्व काल के आयुर्वेद विशेषज्ञ चरकाचार्यजी। ‘चरकसंहिता’ प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ के निर्माणकर्ता चरक जी को ‘त्वचा चिकित्सक’ भी कहते हैं। आचार्य चरक ने शरीर शास्त्र, गर्भ शास्त्र, रक्ताभिसरण शास्त्र, औषधि शास्त्र इत्यादि के विषय में अगाध शोध किया था। मधुमेह, क्षयरोग, हृदयविकार आदि दुर्धररोगों के निदान एवं औषधोपचार विषयक अमूल्य ज्ञान के किवाड उन्होंने अखिल जगत के लिए खोल दिए। चरकाचार्यजी एवं सुश्रुताचार्य जी ने इ.स. पूर्व ५००० में लिखे गए अर्थववेद से ज्ञान प्राप्त करके ३ खंड में आयुर्वेद पर प्रबंध लिखे।
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• शल्यकर्म में निपुण महर्षि सुश्रुत !
६०० वर्ष ईसापूर्व विश्व के पहले शल्य चिकित्सक (सर्जन) महर्षि सुश्रुत शल्य चिकित्सा के पूर्व अपने उपकरण उबाल लेते थे । आधुनिक विज्ञान ने इसका शोध केवल ४०० वर्ष पूर्व किया ! महर्षि सुश्रुत सहित अन्य आयुर्वेदाचार्य त्वचारोपण शल्यचिकित्सा के साथ ही मोतियाबिंद, पथरी, अस्थिभंग इत्यादिके संदर्भमें क्लिष्ट शल्यकर्म करने में निपुण थे । इस प्रकार के शल्यकर्मों का ज्ञान पश्चिमी देशों ने अभी के कुछ वर्षों में विकसित किया है !
महर्षि सुश्रुत द्वारा लिखित ‘सुश्रुतसंहिता’ ग्रंथ में शल्य चिकित्सा के विषय में विभिन्न पहलू विस्तृत रूप से विशद किए हैं । उसमें चाकू, सुईयां, चिमटे आदि १२५ से भी अधिक शल्यचिकित्सा हेतु आवश्यक उपकरणोंके नाम तथा ३०० प्रकार के शल्यकर्मोंका ज्ञान बताया है।
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• नागार्जुन
नागार्जुन, ७वीं शताब्दी के आरंभ के रसायन शास्त्र के जनक हैं। इनका पारंगत वैज्ञानिक कार्य अविस्मरणीय है। विशेष रूपसे सोने धातुपर शोध किया एवं पारे पर उनका संशोधन कार्य अतुलनीय था। उन्होंने पारे पर संपूर्ण अध्ययन कर सतत १२ वर्ष तक संशोधन किया । पश्चिमी देशों में नागार्जुन के पश्चात जो भी प्रयोग हुए उनका मूलभूत आधार नागार्जुन के सिद्धांत के अनुसार ही रखा गया।
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• बौद्धयन
२५०० वर्ष पूर्व (५०० इ.स.पूर्व) ‘पायथागोरस सिद्धांत’की खोज करनेवाले भारतीय त्रिकोणमितितज्ञ । अनुमानतः २५०० वर्ष पूर्व भारतीय त्रिकोणमितिवितज्ञों ने त्रिकोणमितिशास्त्र में महत्त्वपूर्ण शोध किया। विविध आकार-प्रकार की यज्ञवेदियां बनाने की त्रिकोणमितिय रचना-पद्धति बौद्धयन ने खोज निकाली। दो समकोण समभुज चौकोन के क्षेत्रफलों का योग करने पर जो संख्या आएगी उतने क्षेत्रफल का ‘समकोण’ समभुज चौकोन बनाना और उस आकृति का उसके क्षेत्रफल के समान के वृत्त में परिवर्तन करना, इस प्रकार के अनेक कठिन प्रश्नों को बौद्धयन ने सुलझाया।
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• ऋषि भारद्वाज
राइट बंधुओंसे २५०० वर्ष पूर्व वायुयान की खोज करनेवाले भारद्वाज ऋषि !
आचार्य भारद्वाज जी ने ६०० वर्ष इ.स.पूर्व विमानशास्त्र के संदर्भमें महत्त्वपूर्ण संशोधन किया। एक ग्रह से दूसरे ग्रहपर उडान भरनेवाले, एक विश्व से दूसरे विश्व उडान भरनेवाले वायुयान की खोज, साथ ही वायुयान को अदृश्य कर देना इस प्रकार का विचार पश्चिमी शोधकर्ता भी नहीं कर सकते। यह खोज आचार्य भारद्वाज जी ने कर दिखाया।
पश्चिमी वैज्ञानिकों को महत्वहीन सिद्ध करनेवाले खोज, हमारे ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्ष पूर्व ही कर दिखाया था। वे ही सच्चे शोधकर्ता हैं।
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• गर्गमुनि
कौरव-पांडव काल में तारों के जगत के विशेषज्ञ गर्ग मुनि जी ने नक्षत्रों की खोज की। गर्ग मुनि जी ने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन के जीवन के संदर्भ में जो कुछ भी बताया वह शत प्रतिशत सत्य सिद्ध हुआ। कौरव-पांडवों का भारतीय युद्ध मानव संहारक रहा, क्योंकि युद्धके प्रथम पक्ष में तिथि क्षय होने के तेरहवें दिन अमावस थी । इसके द्वितीय पक्ष में भी तिथि क्षय थी । पूर्णिमा चौदहवें दिन पड गई एवं उसी दिन चंद्रग्रहण था, यही घोषणा गर्ग मुनि जीने भी की थी

Tuesday, March 5, 2013

SQL SERVER – Create a Comma saparated List Using SELECT query

Scenario : 

TableName : Person
ID Name
1 Ram
2 Shyam
3 Rohit
4 Mohit
5 Shiv
6 Pinki
7 Sweta
8 Heera
9 Vimal
10 Rajesh

Desired Output
Ram,Shyam,Rohit,Mohit,Shiv,Pinki,Sweta,Heera,Vimal,Rajesh

To get this output, 

Method 1: 

SELECT ',' + Name
FROM Person
FOR XML PATH('') 

Result : ,Ram,Shyam,Rohit,Mohit,Shiv,Pinki,Sweta,Heera,Vimal,Rajesh
Method 2: 

DECLARE @listStr VARCHAR(MAX)
SELECT @listStr = COALESCE(@listStr+',' ,'') + Name
FROM Person
SELECT @listStr

Result : Ram,Shyam,Rohit,Mohit,Shiv,Pinki,Sweta,Heera,Vimal,Rajesh

Thursday, February 2, 2012

Swami Vivekanand stories -1

एक बार जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका गए थे, एक महिला ने उनसे शादी करने की
इच्छा जताई। जब स्वामी विवेकानंद ने उस महिला से ये पुछा कि आप ने ऐसा
प्रश्न क्यूँ किया ?

उस महिला का उत्तर था कि वो उनकी बुद्धि से बहुत मोहित है और उसे एक ऐसे ही बुद्धिमान बच्चे कि कामना है।

इसीलिए उसने स्वामी से ये प्रश्न कि क्या वो उससे शादी कर सकते है और उसे अपने जैसा एक बच्चा दे सकते हैं ?

उन्होंने महिला से कहा कि चूँकि वो सिर्फ उनकी बुद्धि पर मोहित हैं इसलिए कोई समस्या नहीं है। उन्होंने कहा:
...

“ प्रिये महिला, मैं आपकी इच्छा को समझता हूँ। शादी करना और इस दुनिया में
एक बच्चा लाना और फिर जानना कि वो बुद्धिमान है कि नहीं, इसमें बहुत समय
लगेगा, इसके अलावा ऐसा हो इसकी गारंटी भी नहीं है।
इसके बजाय, आपकी इच्छा को तुरंत पूरा करने हेतु मैं आपको एक सुझाव दे सकता हूँ।

आप मुझे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर लें। इस प्रकार आप मेरी माँ बन
जाएँगी और इस प्रकार मेरे जैसे बुद्धिमान बच्चा पाने की आपकी इच्छा भी
पूर्ण हो जाएगी।“

-: ये काम एक सुसंस्कृत भारतीय ही कर सकता है
,यह समस्त विश्व हम भारतीयों को हमारे वर्तमान तरक्की ,या नई शक्तिशाली
सेना या व्यापार के लिए नहीं पसंद करता , बल्कि यह विश्व हमें हमारी 20,000
+ वर्ष पुरानी संस्कृति के लिए पसंद करता है ,सिर्फ यही हमारी पहचान है
......जय हिंद !!!!!!!

एक सच हमारी आज़ादी के बारे में

क्या सच में "आजादी बिना खड़क बिना ढाल" के मिली ? ....
कृपया निम्न तथ्यों को बहुत ही ध्यान से तथा मनन करते हुए पढ़िये:-
1. 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है।
2. 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में ‘विजयी’ देश के रुप में उभरता है।
3. ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है।
4. इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है।
5. जाहिर है, इतना खून-पसीना ब्रिटेन ‘भारत को आजाद करने’ के लिए तो नहीं ही बहा रहा है। अर्थात् उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा है।
6. फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार होता है कि ब्रिटेन हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लेता है?
हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते- क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आये हैं- दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते।
(प्रसंगवश- 1922 में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गाँधीजी को जाता। मगर “चौरी-चौरा” में ‘हिंसा’ होते ही उन्होंने अपना ‘अहिंसात्मक’ आन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अँग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे! दरअसल गाँधीजी ‘सिद्धान्त’ व ‘व्यवहार’ में अन्तर नहीं रखने वाले महापुरूष हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था- कि गाँधीजी ‘स्वयं अपने आप को’ इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहाँ ‘अहिंसा का सिद्धान्त’ भारी पड़ जाता है- ‘देश की आजादी’ पर।)
यहाँ हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस ‘चमत्कार’ का पता लगायेंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की ईच्छा रखने वाले अँग्रेजों को जल्दीबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा।
(प्रसंगवश- जरा अँग्रेजों द्वारा भारत में किये गये ‘निर्माणों’ पर नजर डालें- दिल्ली के ‘संसद भवन’ से लेकर अण्डमान के ‘सेल्यूलर जेल’ तक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने एवं इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!)
***
लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है।
इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं।
फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये, बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादूरी के साथ “भारत माँ की आजादी के लिए” लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर एवं बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो “महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिए” लड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।
सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रुप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रुप में फूटकर बाहर आने लगा।
फरवरी 1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एक हड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है।* कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है।
यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध “राजभक्ति” की नींव को भी हिला कर रख देता है।
जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह “राजभक्ति” ही है!
***
बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी. जब (मार्च’44 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आव्हान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित हो जायें और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें।
इतना तो नेताजी भी जानते होंगे कि-
1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और
2. जापानी सेना की ‘पहली’ मंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (आसाम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) ‘लीडो रोड’ को नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी ‘दूसरी’ मंशा है।
ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था, तो भारत के अन्दर ‘नागरिकों के आन्दोलन’ एवं ‘सैनिकों की बगावत’ पर। ...मगर दुर्भाग्य, कि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत।
इसके भी कारण हैं।
पहला कारण, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह प्रचार (प्रोपागण्डा) फैलाया था कि जापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी।
दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं।
तीसरा कारण, भारतीय जवानों का मनोबल बनाये रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरु कर दिया था। इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन 'अज्ञेय' भी 1943 से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबल बढ़ाने सीमा पर पहुँचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।)
चौथा कारण, भारत का प्रभावशाली राजनीतिक दल काँग्रेस पार्टी गाँधीजी की ‘अहिंसा’ के रास्ते आजादी पाने का हिमायती था, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरु नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर काँग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी!- ऐसी कल्पना नेताजी-जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन “भारतीय जवानों” की “राजभक्ति” के बल पर ही अँग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं।)
पाँचवे कारण के रुप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाय कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की 'कठपुतली सेना' (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्द तथा कार्टून का इस्तेमाल उन्होंने किया था।
***
खैर, जो आन्दोलन एवं बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस “राजभक्ति” के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस “राजभक्ति” का क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है।
वर्ना जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जायेगा... और भारत में रह रहे सारे अँग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिये जायेंगे।
लन्दन में ‘सत्ता-हस्तांतरण’ की योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक तथा दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अँग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी आज तक वेतन ले रहा है, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता है!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाय।




लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर। एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है!
(लेखकद्वय लैरी कॉलिन्स और डोमेनिक लेपियरे द्वारा भारत की आजादी पर रचित प्रसिद्ध पुस्तक “फ्रीडम एट मिडनाईट” में एटली की इस चाल को रेखांकित किया गया है।)
***
बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि ‘गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से’ हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि ‘नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारण’ हमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले-
***
सबसे पहले, माईकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन:
“भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसाकि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों पर चलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।”
***
अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं।
प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो विन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है-
1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और
2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके।
***
यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं:
“... उनसे मेरी उन वास्तविक विन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का "भारत छोड़ो” आन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, “न्यू-न-त-म!” ”
(श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑव बेंगाल’ के प्रकाशक को लिखा था।)
***
निष्कर्ष के रुप में यह कहा जा सकता है कि:-
1. अँग्रेजों के भारत छोड़ने के हालाँकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और- बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के- सिर्फ अँग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था।
2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे- नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति।
3. अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गाँधीजी या काँग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान नहीं के बराबर रहा।

सो, अगली बार आप भी ‘दे दी हमें आजादी ...’ वाला गीत गाने से पहले जरा पुनर्विचार कर लीजियेगा।

Wednesday, January 25, 2012

India's Contribution To the World

1)महाभारत दुनिया का सबसे बड़ा काव्य संग्रह हे।
2) पेंटियम चिप ( Pentium ) के निर्माता विनोद धम भारतीय हैं ।
3)विश्व का तीसरा सबसे अमीर व्यक्ति लक्ष्मी मित्तल भारतीय हैं ।( Fortune पत्रिका के अनुसार )
4)बेब आधारित ई-मेल में हॉट मेल प्रथम है, इसके निर्माता सबीर भाटिया भारतीय हैं ।
5)एटी एंड टी बैल लेबोरेट्री जहाँ कम्पुटर की भाषा C , C++ , Unix बनी वहाँ केप्रेसिडेंट ( President ) अरुन नेत्रावली भारतीय हैं ।
6)Hewlett Packard के जनरल मैनेजर राजीव गुप्ता भारतीय हैं ।
7)माइक्रोसोफ्ट के Testing Director of Windows 2000 सजंय तेजवरिका भारतीय हैं ।
8)सिटी बैंक , Mckensey और Standard chart के Chief Executives क्रमश विक्टोर मेनेजेस , रजत गुप्ता और राना तलवार सभी भारतीय है।
9)निया के सबसे प्रतिष्ठित गणितज्ञ संस्थान ‘अमेरिकन मैथेमेटिकल सोसाइटी’ ने भी अपनी मैगजीन ‘मैथ डाइजेस्ट’ के ताजा अंक में आनंद कुमार को हीरो के तौर पर उभारा है
10)जब कई संस्कृतियाँ 5000 साल पहले घुमंतू वनवासी थीं, भारतीय सिंधु घाटी (सिंधु घाटी सभ्यता) में हड़प्पा संस्कृति की स्थापना हुई।
11)भारत का अंग्रेजी में नाम ‘इंडिया’ इंडस नदी से बना है, जिसके आस पास की घाटी में आरंभिकसभ्यंताएं निवास करती थीं। आर्य पूजकों में इस इंडस नदी को सिंधुकहा गया ।
12) शतरंज की खोज भारत में की गईथी।
13)बीज गणित, त्रिकोण मिति और कलन का अध्य्यन भारत में ही आरंभहुआ था।
14)‘स्था न मूल्यो प्रणाली’ और ‘दशमलव प्रणाली’ का विकास भारत में 100 वर्ष ईसा पूर्व में हुआथा।
15)भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और विश्व का छठवां सबसेबड़ा देश तथा प्राचीन सभ्यभताओं में से एक है।
16)भारत में, विश्व भर से सबसे, अधिक संख्या में डाक घर स्थित हैं।
17)विश्व का सबसे बड़ा नियोक्ताभारतीय रेल है, जिसमें दस लाख से अधिक लोग काम करते हैं।
18)विश्वम का प्रथम विश्वंविद्यालय 700 वर्ष ईसा पूर्व, तक्षशिला में स्था पितकिया गया था। इसमें 60 से अधिक विषयों में 10,500 से अधिक छात्र दुनियाभर सेआकर अध्यन करते थे। नालंदा विश्ववविद्यालय चौथी शताब्दी, में स्था पित किया गया था जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है।
19)आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्सा शाखा है। शाखा विज्ञान के जनक माने जाने वाले चरक ऋषि नें 2500 वर्ष पहले आयुर्वेद का समेकन किया था।
20) भारतीय गणितज्ञ बुधायन द्वारा ‘पाई’ का मूल्य ज्ञात कियागया था और उन्होंने जिस संकल्परना को समझाया उसे पाइथागोरस की प्रमेय करते हैं।
21.सन माईक्रोसिसटमस (Sun MicroSystems ) के को-फाउंडर विनोद खोसंला भारतीय है।
22.भारत 17वीं शताब्दी के आरंभ तक ब्रिटिश राज्य आने से पहले सबसे सम्पन्न देश था। क्रिस्टोफर कोलम्बस ने भारत की सम्पन्नता से आकर्षित हो कर भारतआने का समुद्री मार्ग खोजा, उसनेगलती से अमेरिका को खोज लिया।
23नौवहन की कला और नौवहन का जन्म 6000 वर्ष पहले सिंध नदी में हुआ था। दुनिया का सबसे पहलानौवहन संस्कृत शब्द नवगति से उत्पन्न हुआ है। शब्द नौ सेना भीसंस्कृत शब्द नोउ से हुआ।
24भास्काराचार्य ने खगोल शास्त्र के कई सौ साल पहले पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओरचक्कर लगाने में लगने वाले सही समय की गणना की थी। उनकी गणना के अनुसार सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी को 365.258756484 दिन का समय लगता है।
25. हॉलीवुड ने पहचानी हिन्दी की ताकत – बहुचर्चित मशहूर ओर कामयाबी का नया इतिहास रचने वालीचलचित्र ( फ़िल्म) को दिया वैश्विक हिन्दी नाम 'अवतार'
26. विश्व विरासत बना ऋग्वेद(हिंदू धर्म का पवित्र ग्रंथ ) यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है।
27. विश्व में मोबाइल की सबसे बड़ी कंपनी नोकिया ने हाल ही लन्दन में अपने तीन नए मॉडल बाजार में उतारे आपको ये जानकर खुशी होगी कि इन तीनो मॉडल्स को कंपनी ने हिन्दी का नाम दिया है. इन्हें अमेरिका, यूरोप और एशिया यानी पूरी दुनिया में आशा-300 और आशा-200 मॉडल के फोन लांच किए जाएंगे।
28.अटल बिहारी वाजपयी वे पहले भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ (1977) में हिंदी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था।
 Source Facebook

Tuesday, January 17, 2012

Detecting browser refresh or F5 click on page in c#

Friends,
     I found an interesting problem in my application.
after saving data in database I clear the page and reset all control at the page. but If I click on browser refresh or press F5 on keyboard, Page get post back and save/ update or button click execute again with old values which were exists just before reset data.
So now the records or operation process again which is wrong in my condition and I do not want to process that code again.
I search a lot over Internet for the solution of the above problem and after a lot of findings I found a working solution for me.

So I am going to explain the solution for the convenience of the other developers

#region code to determine Refresh state of Page ie. button click or F5 hit
    private bool _refreshState; private bool _isRefresh;

    protected override void LoadViewState(object savedState)
    {
        object[] AllStates = (object[])savedState;
        base.LoadViewState(AllStates[0]);
        _refreshState = bool.Parse(AllStates[1].ToString());
        _isRefresh = _refreshState == bool.Parse(Session["__ISREFRESH"].ToString());
    }

    protected override object SaveViewState()
    {
        Session["__ISREFRESH"] = _refreshState;
        object[] AllStates = new object[2];
        AllStates[0] = base.SaveViewState();
        AllStates[1] = !(_refreshState);
        return AllStates;
    }
    #endregion

   protected void imgbtnSave_Click(object sender, ImageClickEventArgs e)
    {
        try
        {
            if (!_isRefresh)
            {
         // your code goes here
        }
    }
    }
if  _isRefresh variable is true then user refresh the browser or click F5 


hope this code helps you.....................

Thursday, January 12, 2012

INSERT ROW FROM ONE TABLE TO ANOTHER

Hello Friends,

below written query describes us how to insert Data From One table to another in same Schema Database in oracle


INSERT INTO TX_ITEM_IR_TRN_SUB
   (
-- provide all column here of table i.e. TX_ITEM_IR_TRN_SUB
SELECT   T.YEAR,
             T.COMP_CODE,
             T.BRANCH_CODE,
             T.TRN_TYPE,
             T.TRN_NUMB,
             T.PO_COMP_CODE,
             T.PO_BRANCH,
             T.PO_TYPE,
             T.PO_NUMB,
             T.ITEM_CODE,
             T.TRN_QTY,
             0,
             'UnChecked',
             'NA',
             'NA',
             SYSDATE,
             'AKHILESH',
             T.TDATE,
             '0',
             T.NO_OF_UNIT,
             T.UOM_OF_UNIT,
             T.WEIGHT_OF_UNIT
      FROM   TX_ITEM_IR_TRN T
     WHERE   SUBSTR (T.TRN_TYPE, 1, 1) = 'R'
             AND (T.YEAR,
                  T.COMP_CODE,
                  T.BRANCH_CODE,
                  T.TRN_TYPE,
                  T.TRN_NUMB,
                  T.PO_COMP_CODE,
                  T.PO_BRANCH,
                  T.PO_TYPE,
                  T.PO_NUMB,
                  T.ITEM_CODE) NOT IN
                      (SELECT   YEAR,
                                COMP_CODE,
                                BRANCH_CODE,
                                TRN_TYPE,
                                TRN_NUMB,
                                PO_COMP_CODE,
                                PO_BRANCH,
                                PO_TYPE,
                                PO_NUMB,
                                ITEM_CODE
                         FROM   TX_ITEM_IR_TRN_SUB));



How to find Current GridViewRow in TextBox text change event

Hello Friends,

Now I am going to explain to find a GridViewRow in TextBox TextChanged Event inside GridView

Some times we had a TextBox or CheckBox or any other control inside GridView and we have to find the GridViewRow when the TextChanged or CheckedChanged or concerned Event fires

The following code show us how to do that

protected void txtTest_TextChanged(object sender, EventArgs e)
    {
       // code to find text box
        TextBox txtTextBox = ((TextBox)(sender));
        // code to find GridViewRow using naming container (bubble Event)
        GridViewRow grdRow = ((GridViewRow)(txtTextBox.NamingContainer));
  
       // code to find Label inside GridViewRow
        Label lblTest = grdRow .FindControl("lblTest") as Label;
      
    }


in same way you can find gridview in any event inside gridview

  protected void chkApproved_CheckedChanged(object sender, EventArgs e)
    {
        try
        {
            CheckBox chk = ((CheckBox)(sender));
            GridViewRow gv1 = ((GridViewRow)(chk.NamingContainer));
        }
        catch (Exception ex)
        {
            // handle your exception
        }
     }    

Finding DataListItem in ItemCommand Event of DataList

Dear Friends,

In this post I am going to show how to get the DataLIstItem in ItemCommand Event of a DataList

Here is code for this purpose

protected void dlTest_ItemCommand(object source, DataListCommandEventArgs e)
{
if (e.CommandName == "FindPersonDetail")
{
DataListItem dlItem = (DataListItem)((Control)e.CommandSource).Parent;
string Empname = ((Label)(item.Controls[1].FindControl("lblEmpName"))).Text;
}

In this code, if the command name is FindPersonDetail then I find DataLIstItem of Datalist of the selected Item using Bubble Event. then I find My Label using that DatalistItem.
You can bypass if condition if you not require that.

Hope this code help you...

Wednesday, January 11, 2012

return a table from Function in Oracle

Hello Guys,

Today I am going to explain how to write a function in oracle which return a table as result set.

We have to follow 3 steps to do so.

Step 1: We are going to create a object type that contains the fields that are going to be returned from function.

CREATE OR REPLACE TYPE emp_type as object 
(
id                     number,
name               varchar2(30),
designation      varchar2(50),
salary              number(16,4)
);
/
execute this statement

Step 2: Now we create a nested table type from above Type


CREATE OR REPLACE TYPE emp_type_Table as table of  emp_type;

execute this statement

Step 3:  So It's time to do our real work i.e. create a function


CREATE OR REPLACE FUNCTION fn_get_emp_salary (Pyear  IN  number,
                                                P id   IN number)
   RETURN emp_type_Table
AS
   v_ret   emp_type_Table ;
BEGIN
   SELECT   CAST (
               MULTISET(
                                      -- your query goes here
                                       select id, name, designation, salary from emp 
                                       where id=Pid and year=Pyear
                              )
     INTO   v_ret
     FROM   DUAL;

   RETURN v_ret;
END fn_get_emp_salary ;
/

execute this function.


Now your function is ready and you can call it as shoen below


select * from table( fn_get_emp_salary(2012,25))

I call the function by sending parameter year as 2012 and id as 25


Hope this post help you in writing function in oracle.........

Sunday, May 15, 2011

Taj trip at This weekend

Dear all, 

This weekend I had to go to Gwalior for some reason on saturday and I planned to return on Sunday from there.
I went there with my wife and nephew (Rohan). 

On my return journey, I had a lot of time at Agra and Made my mind for a Taj Mahal Trip.

I uploaded them to my picassa album titled Taj Trip on 15 may

Wednesday, November 24, 2010

Calling server side code from client side

Today, I am going to explain you how to call a server side function/code from client side (JavaScript).

Ajax provide us the facility to use server side code from client side without postback.

You can call server side code by using webservice(.asmx) or using page methods in same aspx page.
The page methods are rendered as inline javascript.

If you are using asp.net 2.0 then you require
ASP.NET AJAX extensions for ASP.NET 2.0

you website need to be ajax enabled for using this functionality.

I just explaining this functionality by a simple Example

add a javascript file naming script.js in you website

and write below methos in your javascript file

function CallMe(src,dest)
 {   
     var ctrl = document.getElementById(src);
     // call server side method
     PageMethods.GetGroupName(ctrl.value, CallSuccess, CallFailed, dest);
 }

 // set the destination textbox value with the ContactName
 function CallSuccess(res, destCtrl)
 {   
     var dest = document.getElementById(destCtrl);
     dest.value = res;
 }

 // alert message on some failure
 function CallFailed(res, destCtrl)
 {
     alert(res.get_message());
 }



now move on to your aspx page
add  a reference of your javascript file in body tag of page


and paste below code 


<form id="form1" runat="server">
    <asp:ScriptManager ID="ScriptManager1" runat="server" EnablePageMethods="true" />
    <div>
        <asp:Label ID="lbl_Group_Code" runat="server" Text="Group Code"></asp:Label>
        <asp:TextBox ID="txt_Group_Code" runat="server"></asp:TextBox><br />
        <asp:TextBox ID="txt_Group_Name" runat="server" ReadOnly="True"></asp:TextBox><br />
    </div>
    </form>





also remember to check following property of script manager in script manager tag
 EnablePageMethods="true" 
this property enables your code to use server side webmethods


now come to your aspx.cs page


write a public static method here as follows


   public static string GetGroupName(string GRP_CODE)
        {
            if (GRP_CODE == null || GRP_CODE.Length == 0)
                return String.Empty;
            OracleConnection conn = null;
            try
            {
                string connection = ConfigurationManager.ConnectionStrings["csTextile"].ConnectionString;
                conn = new OracleConnection(connection);
                string Oracle = "Select GRP_NAME from FA_GRP_MST where GRP_CODE = :GRP_CODE";
                OracleCommand cmd = new OracleCommand(Oracle, conn);
                cmd.Parameters.Add(":GRP_CODE", OracleType.VarChar).Value = GRP_CODE;
                conn.Open();
                string GRP_Name = Convert.ToString(cmd.ExecuteScalar());
                return GRP_Name;
            }
            catch (OracleException ex)
            {
                return "error";
            }
            finally
            {
                conn.Close();
            }
        }





Method should be public static


I use Oracle as database in my website so I use OracleConnection and Command etc...
replace Oracle with sql in your app.


now add following line before your method


   [System.Web.Services.WebMethod]


like this


   [System.Web.Services.WebMethod]
        public static string GetGroupName(string GRP_CODE)
        {
            if (GRP_CODE == null || GRP_CODE.Length == 0)
                return String.Empty;
            OracleConnection conn = null;
            try
            {
                string connection = ConfigurationManager.ConnectionStrings["csTextile"].ConnectionString;
                conn = new OracleConnection(connection);
                string Oracle = "Select GRP_NAME from FA_GRP_MST where GRP_CODE = :GRP_CODE";
                OracleCommand cmd = new OracleCommand(Oracle, conn);
                cmd.Parameters.Add(":GRP_CODE", OracleType.VarChar).Value = GRP_CODE;
                conn.Open();
                string GRP_Name = Convert.ToString(cmd.ExecuteScalar());
                return GRP_Name;
            }
            catch (OracleException ex)
            {
                return "error";
            }
            finally
            {
                conn.Close();
            }
        }




now add the following code in page load event


if (!Page.IsPostBack)
            {
                txt_Group_Code.Attributes.Add("onblur", "javascript:CallMe('" + txt_Group_Code.ClientID + "', '" + txt_Group_Name.ClientID + "')");
                txt_Group_Code.Attributes.Add("onchange", "javascript:CallMe('" + txt_Group_Code.ClientID + "', '" + txt_Group_Name.ClientID + "')");
            }

now test your code

write if any problem occurs

have a happy coding